एक देर रात की बात है। मैं अपने ऑफिस में जो कि मेरा घर भी है, खाना खाकर सो रहा था। अक्सर मुझे रातों को नींद नहीं आती है, तो उस रात भी कुछ ऐसा ही था। मैं बिस्तर के साथ जद्दोजहद कर रहा था और नींद के बिस्तर की तरफ था।
देर रात कुछ 1:00 AM-1:30 AM का समय होगा। मेरे घर की बेल बजी। हालांकि मैं सो तो नहीं रहा था, पर मुझे लगा कि मेरी नींद खराब हुई। खैर मुझे अच्छा नहीं लगा।
मैंने दरवाजा खोला तो सामने एक अच्छी खूबसूरत लड़की – भरी-पूरी, सुंदर, अच्छी लंबाई-चौड़ाई। मैंने उसे अंदर बुलाया। उसने मेरे कान पर दो-तीन बजाए। मुझे उस वक्त लगा कि देखो मना कि मैं अच्छा नहीं दिखता, पर इतना बुरा हूँ कि देखते ही 2-4 कान पर लगा दिए…
हम अंदर मेरे ऑफिस में आए, जहाँ मैं सोया हुआ था। सब कुछ बिखरा हुआ ही पड़ा था। उसने फिर अपने 2-4 हाथ फेंके। उसके बाद वह शांत हो गई और फूट-फूट कर रोने लगी।
कुछ देर बाद, ज्यादा से ज्यादा कुछ सेकंड हुए होंगे, वह वही बेड पर धड़ाम से बैठ गई जैसे गिर गई हो। तो मैं उसके बाजू से बैठ गया। मैंने उसका हाथ पकड़ा, उसे हग किया। फिर वह एकदम से और तेज रोने लगी। रोते-रोते भी उसने अपने नाखून मेरी पीठ में घुसेड़ दिए, और मेरे left shoulder पर बहुत जोर से दांत काटा। मैं खुद बहुत जोर से चिल्लाया। वहाँ से ब्लीडिंग शुरू हो गई।
वह लड़की और जोर से चिल्लाने लगी और रोने लगी। उसके नाखून मेरी पीठ में और deep कर दिए। मुझे अच्छे से याद है, मुझे बहुत दर्द हो रहा था। पर फिर कुछ सेकंड बाद मुझे मजा आने लगा।
मैंने उस लड़की को और थोड़ा टाइट हग किया और बेड पर हम बैठे ही हुए थे। मैंने उसे लिटा लिया, खुद भी लेट गया। फिर मैंने उसका सिर अपनी छाती की तरफ प्रेस किया। पर उसने मेरे same hand के arm पर फिर से दांत काटा। इस बार उतना जोर लगाकर नहीं, पर मेरी चीख निकलने के बहुत ज्यादा था।
उसके बाद वह loose होती गई, और loose होती गई। फिर उसने कोई हलचल नहीं की और सो गई। मैं उसी के पास सोता रहा। उसने करवट बदली, मैंने बदली।
मेरे कमरे के जंगले से रोशनी आती है जिससे सुबह होने का पता चल जाता है। आँख खुली तो देखा कि उसका चेहरा सूजा हुआ है – बहुत रोने की वजह से सूज गया होगा। काफी देर हो गई, मैंने उसे नहीं उठाया। पर और कुछ देर बाद वह खुद उठ गई। उसने ज्यादा देर नहीं लगाई – उठी, संभली और चली गई।
नया ज़ख्म आपको तुरंत दर्द नहीं देता। आपको दर्द का एहसास बहुत देर बाद होता है।
रात को तो उतना दर्द नहीं हुआ, पर सुबह मैं अपने हाथ को move नहीं कर पा रहा था। मैं करवट लेते हुए उठा, जल्दी से दवा की, इंजेक्शन लिए। उस एक रात के बाद मैं कई दिनों तक न हाथ का use कर पाया, न पीठ के बल सो पाया।
खैर, अब न वो ज़ख्म है न दर्द – बस वो यादें हैं उस रात की।
कई बार हम, मैं भी, बहुत दुखी हो जाते। लोगों के रवैये और rejection से, बहुत effort करने के बाद भी हमें वो मिलता है जो किसी को नहीं मिलना चाहिए। ऐसे में हम बहुत दुखी हो जाते हैं।
हमारे ही अंदर से दुख का ज्वालामुखी फटकर बाहर निकलना चाहता है। पर ये ख्याल भी आता है कि इस दुख की आग में मैं किसी और को भी जला सकता हूँ। फिर कोई क्यों उस आग में जले? कोई किसी के दुखी होने की वजह से खुद को दुखी क्यों करे? क्यों दर्द सहे? क्यों ज़ख्म ले? खुद को क्यों चोट पहुँचाए?
ऐसे में वो ज्वालामुखी अंदर ही फट जाता है और अंदर ही अंदर जलता रहता है। बहुत दर्द होता है – बहुत ज्यादा।
दुख के गुस्से में और किसी और तरह के गुस्से में बहुत से फर्क होते हैं।
उनमें से एक होता है कि दुख में इंसान डायलॉग कम बोलता है, ड्रामा ज्यादा होता है। जबकि दूसरे में ड्रामा कम होता है, डायलॉग ज्यादा।
जो इंसान गुस्से में होता है वो ज्यादा बोलता है, वो explain करता है – उसका गुस्सा और उसकी वजह। दुखी इंसान चुप रहता है।
गुस्से में इंसान जवाब माँगता है, और एक valid जवाब जो सही हो, जो वाजिब हो। पर एक दुखी इंसान को बस शांति चाहिए होती है। वो कुछ बोलना नहीं चाहता, कोई जवाब नहीं देना चाहता। वो बस बिलबिला कर रोना चाहता है, चिल्लाना चाहता है, खामोश रहना चाहता है।
मैंने जब उस लड़की को देखा, मैं बेशक नींद से परेशान था, पर मेरी जिंदगी रोज इन्हीं परेशानियों से होकर जीना और जरूरी काम करना है।
मुझे देखते ही उसका दुख का ज्वालामुखी मुझ पर फूट पड़ा है। बहुत अच्छी बात है! इस तरह उसी का वह ज्वालामुखी कई बार मुझ पर फूटा। जब वो पूरी तरह से खाली हो गया, वो खुद शांत हो गया।
मैंने उससे कोई सवाल नहीं पूछा, न वजह जानने की कोशिश की। उस वक्त मेरा कुछ भी करना उस ज्वालामुखी के फटने पर रोक लगा देता। कुछ अगर रह जाता तो वो बाद में उसके अंदर फटता और तकलीफ देता।
मैंने कुछ भी नहीं किया। मैंने उसमें कोई part नहीं लिया, जो किया उसने खुद कर लिया। और फिर खुद शांत हो गई, खुद संभाली और चली गई।
दुख में इंसान ज्यादा समझदार हो जाता है। इसीलिए शायद ज़ख्म की गहराई देखने के बाद इंसान जज़्बात की गहराई भी समझ लेता है। बहुत दर्द देखने के बाद आदमी उन जज़्बातों को अलफाज़ में भी उतार देता है।
कभी अगर ऐसा हो जाए आपके किसी दोस्त के साथ, किसी जानने वाले के साथ, किसी खास के साथ – तो वो बहुत समझदार है क्योंकि वो दुखी है। वो ये बात जानता है कि उसे रुकना चाहिए, उसे संभलना चाहिए। जो हो गया सो हो गया, भूल, मत रो, खुद को संभालो, फैमिली देखो, घर देखो, अपने आप को देखो – ये सब मत कहो।
ये सब बातें उसे अच्छी नहीं लगेंगी, उसे और hurt करेंगी। बल्कि चुपचाप जो वो कर रहा है, उसे करने दो। वो थोड़ी देर रोएगा, चिल्लाएगा, थक जाएगा, सो जाएगा, उठेगा, संभलेगा, चलने लगेगा।
तुम बस वहीं रहो, वहाँ से जा सो मत। उससे पूछो मत, उसे समझाओ मत, उसे रोको मत। बस खड़े रहो और देखते रहो। अगर वो खुद को ज्यादा नुकसान पहुँचाने की सोचे – जैसे खुद को shoot कर लेना, या poison पी लेना, खुद को stab कर लेना, building से कूद जाना, गाड़ी के आगे आ जाना – ऐसा कुछ करे तो जरूर रोकना। या और कोई तरीका जिससे वो खुद को ऐसा नुकसान न पहुँचा ले जो ज्यादा हो जाए।
जब वो ऐसा करे, तो उन्हें एक अच्छी जगह देना जहाँ वो अपना दुख का ज्वालामुखी फोड़ सके। और उन्हें देखते रहने बस… पूरे ध्यान से…
वो कुछ देर बाद खुद संभल जाएँगे, और पहले से बेहतर हो जाएँगे।
मुझे उस लड़की से सिर्फ दो शिकायतें हैं:
पहली – उसने मेरी फीस नहीं भरी
दूसरी – मेरे इलाज का खर्च भी मुझे अपनी पॉकेट से करना पड़ा
अगर तुम इसे पढ़ रही हो तो फटाफट pay कर दो। और अगली बार कोई भी ऐसे आए तो pay करके जाए… बहुत खर्चा होता है भाई! Blood की वजह से bedsheet गंदी हो गई थी, उन्हें भी धोना पड़ता है…