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The treatment of gulit

वो कहते हैं कि हम सबने कभी न कभी ऐसे काम किए होते हैं जिन्हें हम मानना नहीं चाहते। जिनसे हमारी सामाजिक छवि या हमारी स्वयं की नज़रों में ही हम गलत साबित हो जाएं। कई बार हम गलती करते हैं, पर उसे स्वीकार नहीं करते। वो कहते हैं कि हम सब ऐसा करते हैं।वो कहते हैं कि जब आप किसी भावना या सत्य को स्वीकार नहीं करते तो यह भी उसे नकारना कहलाता है। आप उस भावना को एक बार नहीं, बार‑बार नकारते रहते हैं। इस तरह, उसे नकारने के लिए हम उसके विपरीत एक और भावना पैदा करते हैं। परिणामतः शरीर और मस्तिष्क के भीतर एक निरंतर गतिविधि चलती रहती है। यह निरंतरता बेचैनी बन जाती है। शरीर विश्राम चाहता है, पर संभव नहीं होता, क्योंकि हम विरोध करते रहते हैं। ऐसे में वह चोट बार‑बार याद आती है। यह ठीक वैसा है जैसे घाव है और हम उसे बार‑बार कुरेदते हैं और फिर भी उम्मीद रखते हैं कि वह भर जाएगा।जब मन, मस्तिष्क और चेतना में यह सब साथ‑साथ होता है, तो सुकून संभव नहीं। सुकून पाने के लिए जड़ पर काम करना पड़ता है। वो कहते हैं कि जैसे पेड़ को सिर्फ पत्तों पर पानी डालने से वह नहीं बढ़ता, जड़ों को सींचना पड़ता है। किसी भी परिणाम के लिए उसकी जड़ों पर ही काम करना आवश्यक होता है।वो कहते हैं कि इस बेचैनी का कारण वही भावना है जिसे हम नकारते हैं। जब तक हम उसे स्वीकार नहीं करते, वह हमें परेशान करती रहती है। जैसे ही हम उसे स्वीकार करते हैं, अंदर की सारी गतिविधियां शांत होने लगती हैं। शरीर सुकून की अवस्था में आ जाता है। वो कहते हैं, जो सच है, उसे अपनाओ। जिसे नकारते हो, वही तुम्हारी परेशानी की जड़ है।ऐसी ही एक समस्या मेरे एक क्लाइंट को थी। उन्होंने अपॉइंटमेंट लिया और कहा — “मैं बहुत परेशान हूं। मेरा दिमाग फटता है। खाना खाता हूं तो अच्छा नहीं लगता, पानी पीता हूं तो अच्छा नहीं लगता, सोता हूं तो नींद नहीं आती। ऐसा लगता है मैं खुद अपने ही खिलाफ हूं।”उस समय तक मैं समझ चुका था कि समस्या भीतर के अपराधबोध और अस्वीकृति से जुड़ी है, लेकिन मैंने सीधे यह नहीं कहा क्योंकि संवाद में कुछ नियम होते हैं। सीधे कहना ट्रिगर कर सकता था। इसलिए मैंने उनसे कहा —

“आपके भीतर बहुत सारे राज़ हैं जिनका बोझ बढ़ गया है। अब इस बोझ को हल्का करने की ज़रूरत है।”शुरुआत में उन्होंने मना किया, लेकिन मैंने भरोसा कायम रखने की बात की — कि उनकी बातें, उनका नाम, सब कुछ गोपनीय रहेगा। फिर धीरे‑धीरे उन्होंने सब कहना शुरू किया। बहुत समय लगा, बहुत‑से राज़, गलत काम और अधूरे पछतावे बाहर आए।हर बार मैंने उनसे पूछा — “आपको क्या लगता है, आपने जो किया वह सही था या गलत?”

वो जवाब देते रहे। फिर मैंने पूछा, “अब आपको क्या करना चाहिए?”

उन्होंने कहा, “अब कुछ नहीं किया जा सकता, बहुत देर हो चुकी है।”मैंने पूछा, “क्या आपने कभी कुछ सुधारने की कोशिश की?”

उन्होंने जवाब दिया, “नहीं।”

फिर मैंने पूछा, “क्या आपने किसी और को ये बातें बताई?”

उन्होंने कहा, “नहीं।”तब मैंने कहा, “तो आपको क्यों लगता है कि कुछ नहीं किया जा सकता?”

वो बोले, “क्योंकि अगर कुछ किया तो बहुत नुकसान होगा — कारोबार खत्म, जेल, ज़िंदगी बर्बाद।”मैंने पूछा, “क्या ऐसा कोई रास्ता नहीं हो सकता जिससे नुकसान कम हो, पर आप सुधार भी कर सकें?”

थोड़ी देर और गुस्से के बाद उन्होंने कहा, “शायद रास्ता हो भी सकता है।”मैंने कहा, “तो चलिए, वही रास्ता खोजते हैं।”

और फिर धीरे‑धीरे, उन्हें उसी दिशा में भेजा जहाँ अपराधबोध की जगह आत्म‑स्वीकृति और सुधार की भावना पैदा हो सके।वो कहते हैं — आदमी कई बार अपनी भावनाओं को स्वीकार करना चाहता है, मगर परिणामों के डर से टालता रहता है। पर असली मुक्ति तभी है जब हम स्वीकार कर लें।

हर गलती सुधारने का रास्ता होता है — जो रास्ता तुम्हें ठीक लगे, वही चुनो।

पर स्वीकार से भागो मत, क्योंकि ये तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेंगे। इन्हें अपना लो और सुकून पा लो।

 

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