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How to overcome dippeession, how to overcome emmotional breakout

वे कहते हैं कि कई बार इंसान को सिर्फ अपनी परेशानी के अलावा कुछ नहीं दिखता, कई बार इसी वजह से वह समाधान को भी नहीं देख पाते। हकीकत तो यह होती है कि वह देखना ही नहीं चाहते क्योंकि यह भावना, उनकी सोच में कि उनके साथ बहुत बुरा हुआ या उनके साथ ही बहुत बुरा किया गया, यह बहुत आरामदायक भावना होती है, बहुत आकर्षक होती है। इंसान एक भावनात्मक दीवार खड़ी कर लेता है जिससे कि उसकी भावना जो गलत है वह बाहर नहीं निकल पाती न बाहर से जो अच्छी ऊर्जा है वह अंदर आ पाती है। कई बार लोग जानबूझकर ऐसा करते हैं, वे खुद को बहुत अच्छा योग्य समझते हैं, और यह सिर्फ उनके नजरिए में उनका ख्याल होता है क्योंकि वे अपने शब्द, अपनी भावनाएँ बाहर नहीं जाने देते न बाहर की भावनाएँ या अच्छी ऊर्जा उन तक आती। यह दीवार धीरे-धीरे बहुत मजबूत होती चली जाती है, जो बाद में बहुत अवसाद का कारण बनती है। लगभग सभी अवसाद का मुख्य कारण ऐसे ही बनी हुई भावनात्मक दीवारें होती हैं जो इंसान को बाहर की भावनाओं या जुड़ाव से काट देती हैं। और अगर मैं इसे दूसरे शब्दों में समझाने की कोशिश करूँ तो, जैसे नदी के पानी को किसी बर्तन में बंद कर दूँ तो कुछ समय बाद उसी पानी में से बदबू आने लगती है, लेकिन वही पानी बहुत समय से उस नदी में बहता रहता है। तो जब हमारी दीवार के भीतर वाली भावनाएँ, अनुभव, बातें, जो भी हमने किसी से साझा नहीं किए, वे सड़ने लगते हैं तो वे बुरी भावनाएँ देते हैं, उसे ही अवसाद कहते हैं। साथ ही वे कहते हैं कि भावनाओं या अनुभवों का एक दीवार के भीतर रह जाना अवसाद का कारण होता है।

वे आगे जोड़ते हैं और कहते हैं कि इंसान बहुत जल्द इस बात को मानता नहीं है, वह स्वीकार नहीं करना ही शुरुआत होती है। इंसान सच को और अपनी सच्ची भावनाओं को स्वीकार नहीं करता, वह उनसे लड़ता रहता है जिससे कि एक तनाव पैदा होता है। वे कहते हैं कि वही तनाव अवसाद होता है। अवसाद या कोई आघात है तो उसके लिए हमें उस दीवार को तोड़ना पड़ता है। जब तक वह दीवार टूट नहीं जाती, तब तक अंदर जो नकारात्मक हवा है या ऊर्जा या गंध या जो भी है, वह बाहर नहीं आ सकती, और न ही बाहर से अंदर कुछ जा सकता है। पर इस दीवार को तोड़ना इतना आसान नहीं होता, यह बहुत संवेदनशील होती है। जैसे दीवार को छूते ही इंसान उत्तेजित हो जाता है। तो ऐसे मामले को बहुत समझबूझ से संभालना होता है।

यह जो मामला है, यह भी ऐसे ही एक इंसान का है। मेरे मुवक्किल ने काफी समय पहले ऐसी एक दीवार बना ली थी। उन्होंने लोगों से अपनी भावनाएँ साझा नहीं कीं, न वे दूसरे के विचारों पर ध्यान देते हैं। कुछ घटनाएँ इसका कारण हो सकती हैं। पर किसी भी हालत में बाहरी दुनिया से खुद को काट लेना कम समय के लिए अच्छा हो सकता है पर लंबे समय के लिए नहीं। वे कहते हैं कि जिस तरह पौधे का अपना पानी बदलते रहना जरूरी है, आपके विचारों का भी आदान-प्रदान होना जरूरी है। जो भावनाएँ आपके भीतर हैं, उनका बदलते रहना जरूरी है। ऐसा न करने पर इंसान मानसिक रूप से अस्थिर, भावनात्मक रूप से परेशान और शारीरिक रूप से अस्वस्थ हो सकता है। मेरे मुवक्किल हर दूसरी या तीसरी पंक्ति में यही बार-बार कह देते कि “तुम नहीं समझोगे, मेरे साथ यह हुआ, दुनिया ने यह किया वह किया,” अपना दुख सुनाते। अब मुझे उनकी दीवार तोड़नी थी, किसी तरह, ताकि मेरी बात उन तक पहुँचे तो सही। कोई भी सभ्य रास्ता नहीं हो सकता था। तो मैंने उनसे कहा कि आप में और भिखारी में कोई फर्क नहीं है। वे कहते हैं कि “मेरे पिता नहीं हैं, मेरी दो बेटियाँ हैं और उनकी शादी करनी है, मेरे बच्चे ने दो दिन से कुछ नहीं खाया है, मेरे पति नहीं हैं, मेरी आँख का ऑपरेशन कराना है, मेरे घर में कोई कमाने वाला नहीं है…” आप भी उन्हीं की तरह अपना दुख ही सुना रहे हैं और मुझसे हमदर्दी चाहते हैं। तो मैंने उनसे कहा, आप ईमानदारी से सोचें और बताइए कि क्या आप जो दुख बता रहे हैं, वह सच में दुख है? या आप सोच कर बताइए कि इस दुनिया में कौन है जो आपसे कम दुखी है? यहाँ सभी के ब्रेकअप हुए हैं, सभी को जिसे चाहते हैं वह नहीं मिले, सभी के सपने पूरे नहीं हुए, सभी के परिवार में झगड़े रहते हैं, सभी की मानसिक स्थिति भी परेशान रहती है, सभी सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं। तो आपके साथ अलग क्या है? यह तो सबके साथ है और सामान्य है। एक भिखारी की तरह अपने आप को लोगों के सामने पेश करने से क्या आपको लगता है कि आपको राजा जैसी इज्जत मिलेगी? लोग शायद आपको इसीलिए वह नहीं दे रहे जो आप सोचते हैं, वे आपको दयनीय और तुच्छ नजरों से इसीलिए देखते हैं, क्योंकि आप उनके सामने इस तरह से पेश आते हैं। भिखारी पैसे माँगते हैं, आप लोगों से सांत्वना माँग रहे हैं। और आप कुछ भिखारियों की तरह, जो लोगों को ज्यादा भीख देने के लिए मजबूर करते हैं, वैसे ही मजबूर कर रहे हैं, तो वे जैसे भिखारी से दूर भागते हैं, वैसे ही आपसे दूर भाग रहे हैं। ऐसे मामले में आपको मुवक्किल पर दबाव डालना होता है। तो मैंने कहा कि अगर मैं गलत कह रहा हूँ तो बताइए, क्या जिंदगी में सभी के साथ एक जैसी समस्याएँ नहीं हैं? क्या आपके अलावा दुनिया में किसी का ब्रेकअप नहीं हुआ? क्या वे भी आप ही की तरह वहीं बैठे रहें कि अब कुछ नहीं हो सकता? क्या दुनिया में सिर्फ आप ही अकेले हैं जिनकी नौकरी छंट गई? और सबसे बड़ी बात, सारे फैसले आपने खुद ही तो कर लिए, सर। आपने किसी को अपनी समस्याएँ बताई नहीं, न कहीं समाधान ढूंढा ही नहीं, और आपने खुद ही फैसला कैसे कर लिया कि अब कुछ नहीं हो सकता? क्या आपको नहीं लगता कि वह भिखारी जो भीख माँगता है, यह कहकर कि मेरी बीवी का इलाज कराना है, मेरी दो बेटियाँ कुंवारी हैं, मेरे घर कोई कमाने वाला नहीं है, उसके पास और भी रास्ते हैं? इलाज के लिए… बहुत सारे और बहुत अच्छे सरकारी अस्पताल हैं। मेरी खुद कई सर्जरी हुई हैं, मेरे पिता साहब की हुई है। दुनिया में हर तरह का आदमी है, तो क्या उनके स्तर के लोग नहीं होंगे जिनसे वह अपनी बेटियों की शादी करवा सके? या अंकल के लायक दुनिया में कोई काम होगा ही नहीं? पर इस तरह की बात करने से केवल उन्हें सहानुभूति मिलती है, इज्जत नहीं। आपको भी सहानुभूति मिलती है, पर आपको वह सहानुभूति नहीं चाहिए, इज्जत चाहिए। अभी आपको भिखारी जितनी इज्जत मिलती है, अब आपको जितनी ज्यादा इज्जत चाहिए, तो आपने अपना स्तर भी ऊपर करना पड़ेगा।

यह बहुत लंबा हो गया, मुझे लग ही रहा था कि शायद कहीं उनके लिए ज्यादा न हो गया हो, क्योंकि इंसान बिगड़ जाते हैं कई बार, क्योंकि इन मामलों में वे बहुत संवेदनशील होते हैं। तो कोई भी पाठक ऐसा मामला संभालने की कोशिश न करे। हमें ऐसे मामले संभालने का अभ्यास है, तो यह काम किसी पेशेवर के लिए छोड़ दें। मैं तैयार था कि अगर कोई संवेदनशील मुद्दा दब गया होगा तो उसे संभालने के लिए। उन्होंने समय लिया और मेरी बात उनको समझ आई। कुछ देर न मैंने कुछ बोला, न उन्होंने कुछ, और मैंने भी बात नहीं करना ही सही समझा, क्योंकि बात को पचाने के लिए समय चाहिए। तो थोड़ी देर में झलककर वे बोले, “कहाँ, अब बताओ क्या करूँ? मेरा सिर फट रहा है।“ यहाँ दीवार टूट गई। हम सफल हो गए। अब वे सुनने के लिए तैयार हो गए। फिर मैंने उनसे धीरे-धीरे उनकी घटनाएँ, जो उनके अंदर ही फँसी हुई थीं, वे सुनीं। मैंने कोई राय नहीं दी, न कोई सलाह दी, न कोई सांत्वना, कुछ भी, कोई सहानुभूति नहीं, बस उन्हें जब-जब जरूरी लगा, तो मैंने पानी दिया। जब सब कुछ खत्म हो गया, तो मैंने उनसे पूछा कि अब आप क्या करेंगे? उन्होंने कहा कि “अब जब यह सब बातें मैं सोचता हूँ तो समझता हूँ कि बहुत ज्यादा बड़ी बातें नहीं थीं। सामान्य थीं, सभी की जिंदगी में यह होता है, तो मेरी जिंदगी में भी हुआ।“ वे बोले कि “अब मैंने तुमसे बात की तो अच्छा लगा।“ फिर मैंने उन्हें समझाया कि… आपकी परेशानी यह थी कि आपने अपने आप को बाहरी दुनिया से अलग कर लिया, आपने अपना जुड़ाव तोड़ लिया। जिसकी वजह से जो नई ऊर्जा आपको मिल रही थी, वह मिलनी बंद हो गई। और जो ऊर्जा अंदर आकर फँस गई थी, वह बाहर नहीं निकल पाई। मैंने बहुत न करते हुए भी उन्हें बताया कि विचारों का आदान-प्रदान होना बहुत जरूरी है। मैंने उन्हें बताया कि जिंदगी एक पौधे की तरह है, उसमें विचारों का पानी हमेशा बदलते रहना जरूरी है।

मैंने उनसे कहा कि जिंदगी में कुछ भी हो, कितनी भी समस्याएँ आएँ, बाहरी दुनिया से कुछ समय के लिए अलग होना ठीक है, पर एक लंबे समय तक अलग रहना आपके लिए मुश्किल खड़ी कर देता है। लोगों से जुड़े रहें, उनके साथ अपने विचारों का आदान-प्रदान करें और अपनी जिंदगी के पौधे को बढ़ने दें।

मैंने उनसे कहा कि एक महीने के लिए आप इसे आजमाएँ। जो भी नतीजे होते हैं, मुझे बताएँ। अगर नतीजे अच्छे हैं तो जारी रखें, नहीं तो कुछ और समाधान देखते हैं।

वे कहते हैं कि किसी भी बात के आघात से निकलने के लिए एक चक्रीय प्रक्रिया को अपनाएँ। फिर कभी किसी आघात या किसी तरह के अवसाद का हिस्सा नहीं बनेंगे, साथ ही साथ अगर आप पहले से ही इसके शिकार हैं तो यह आपको उससे निकाल देगा।

वे कहते हैं कि सबसे पहले स्वीकार करें। जिंदगी की सच्चाई को, अपनी सच्चाई को, वक्त की सच्चाई को स्वीकार करें। ऐसा करने से आप संतुष्ट रहेंगे और आपने अपने आप को फँसने से पहले ही बचा लेंगे।

दूसरे चरण में वे बोलते हैं कि आपकी जिंदगी में जो भी हुआ है, इसके लिए आप ही जिम्मेदार हैं। इस बात को भी स्वीकार करें और जिम्मेदारी लें, दूसरों को दोष न दें। न वक्त को, न हालात को, न लोगों को। अपने ऊपर जिम्मेदारी लें। यह आपको टकराव से बचाएगा, जो भीतरी भी हो सकते हैं और बाहरी भी। एक संघर्ष होता है विचारों के बीच, आपके भीतर होता है, वह रुक जाता है। और बाहर भी आप एक बड़े टकराव को खत्म कर सकते हैं। खैर, वहाँ और भी सारी बातें होती हैं।

इन दोनों चरणों में वे कहते हैं कि अब आपने स्वीकार कर लिया कि आपकी गलती है और क्या गलती है, यह भी आपको पता है, तो आपकी जिम्मेदारी क्या है, इस बात को समझें।

तीसरेचरण में वे कहते हैं कि आपने गलती मान ली और जिम्मेदारी ले ली, काफी नहीं है। आपको एक सही कार्यवाही करनी होगी। जो तार्किक, उचित, न्यायसंगत, साथ ही भविष्य की सोच रखने वाला हो। मतलब कि अच्छे भविष्य के लिए हो।

आखिरी चरण में वे कहते हैं कि ऐसा कभी नहीं होता कि आप कुछ हमेशा के लिए भूल जाते हैं। कुछ वक्त के लिए आप उन बातों को किसी वजह से भूल जाते हैं, पर वे आपको एक दिन याद आती हैं। तो जब ऐसा हो, उन भावनाओं को, उन विचारों को, बहुत विनम्रता से अस्वीकार कर देना होगा।

वे कहते हैं कि इन चार चरणों को अपनाकर आप किसी भी बात के आघात, अपराधबोध, पछतावे, अवसाद, तनाव, या अतीत से निकल जाते हैं। वे जोड़ते हैं कि शुरू के कुछ दिन इन्हें अपनाने में थोड़ा अजीब लगता है, भारीपन महसूस होता है। पर लगातार कुछ समय तक करते रहने पर बहुत कमाल के नतीजे मिलते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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