How to call God, bhgvaan ko kese bulaye
हमारे एक दोस्त हमें लिखते हैं, “क्या ईश्वर सिर्फ उनके लिए आते हैं जो उसमें आस्था रखते हैं या वे पाखण्ड करते हैं? क्या ईश्वर मेरे लिए भी आएंगे पर मैं किसी तरह का पाखण्ड नहीं करता। मैं न मंदिर जाता हूँ, न उसकी तस्वीर लगाकर घूमता, न कभी तिलक लगाता हूँ। कोई अगर मुझे राम राम कह देता है तो मैं उसे मुस्कुरा कर राम राम कह देता हूँ। मुझे उसे मानने वालों से दिक्कत नहीं, बस उन तरीकों से दिक्कत है.. क्या ईश्वर मेरे जैसे नास्तिक के लिए भी आएगा?”
वो कहते हैं, तेरा मुझे मानना भी मेरी मर्जी है, और तेरा मेरे खिलाफ होना भी मेरी मर्जी। वो कहते हैं कि तू जो करता है वो मेरी मर्जी से, तू जो नहीं करता वो भी मेरे कहने की वजह से।वो कहते हैं, बंदे तेरी कोई मर्जी नहीं है, जो होता है तो सब मेरी मर्जी से।मैं चाहता हूँ जैसा तू सोचता है, मैं चाहता, हूँ तो सोचना बंद करता है। वो कहते हैं मैं चाहता हूँ तो तू सजदा करता है, मैं चाहूँ तो तू बगावत करता है। , वो कहते हैं कि मैं चाहता हूँ तो तू मुझे मानता है, जो मैंने नहीं चाहा तो तू नहीं मानता। मैं चाहता हूँ तो तू मेरा हर बात मानता है , और जो नहीं चाहता तो मुझसे सवाल करता है। वो कहते हैं तुम्हारा कुछ कुछ नहीं है, सब मेरी मर्जी है। वो कहते हैं जो हुआ मेरी मर्जी से हुआ,वो कहते हैं जो अभी नहीं हुआ वो मेरी मर्जी से नहीं हुआ।कहते हैं जो हो रहा है वो सब मेरी मर्जी से हो रहा है, और जो नहीं हो रहा है वो भी मेरी मर्जी से नहीं हो रहा है। जो होगा तो मेरी से मर्जी होगा, अगर मैं नहीं चाहूंगा तो नहीं होगा। यही गीता में लिखा है, यही कुरान में लिखा है, यही बाइबल में लिखा है, यही संतों की बातों में है, यही गुरुओं की वाणी में, यही बात फकीरों ने कही, यही बात साधु कहते हैं, यही बात महात्मा कहते हैं, यही बात पीर कहते हैं, यही औलिया बताते हैं, यही बात दासों ने कही, कि मीरा यही कहती रही, कि राधा भी यही कहती थी, यही बात मसीह साहब ने कही और यही बात मोहम्मद ने कही, यही गुरु ने कही…सभी ने कहा है कि “जो वो चाहता है वही होता है, और जो नहीं हुआ वो बस इसलिए नहीं हुआ कि वो नहीं चाहता।“
तो अगर तुम उन्हें नहीं मानते तो वो यही चाहतें हैं कि तुम उन्हें मानो, इसमें आस्तिक या नास्तिक जैसा कुछ भी नहीं है।
रही बात तरीकों की, मीरा ने कहा कोई पाखण्ड किया, हरि भजन गाती थी, हरि सुनाती, गिर जाती थी, तो हरि का नाम लेती, कहती “तुमने गिरा दिया,” फिर चलती तो कहती “पहले मुझे गिरा दिया, अब मेरे दर्द को अपने ऊपर ले लिया, अजीब प्यार है तेरा।
“राधा ने कभी रीतियों या रिवाजों के हिसाब से कान्हा नहीं बुलाये, कभी किसी मंदिर जाकर दिया नहीं जलाया, वो बस कहती थी “कन्हा कहाँ हो तुम,” उन्हें आवाज लगाती थी, और वो चले आते थे, राधा उन्हें आता हुआ देखकर रूठने का नाटक करती थी।
किसी दास ने कोई खास तरीका थोड़ी बताया, उन्होंने कहा “तुम बुलाओ वो आते हैं”। कइयों ने इन प्रथाओं को, इन रिवाजों के बारे में लिखा है।
मसीह साहब तो, सड़कों पर चलते लोगों के जख्म ले लेते थे और कहते थे, “he is the only one who is surffring” वे कहते हैं, जिन्हें चोट लगी उन्हें दर्द नहीं होता, मैंने जख्म लिया मुझे भी दर्द नहीं है, दर्द तो उस क्रिएटर को होता है।
सभी गुरुओं ने “सच्चा बादशाह” कहा, वे कहते हैं कि सच्चे बादशाह के आगे सिर झुकाने को, वो भी उसकी इज़्ज़त में, और वो भी जिसका मन करे वो।
हर किलोमीटर पर तरीके रिवाज,और रस्में बदल जाते हैं, इसलिए कोई एक पक्के तौर पर मानना वाला रिवाज नहीं। तो ऐसा नहीं समझो कि ईश्वर को बुलाने का कोई खास तरीका होता नहीं, जैसे बाकी को आवाज देकर बुलाया जाता है, वैसे ही ईश्वर को भी बुलाया जाता है।
जैसे कि इंसान किसी शादी या किसी और फंक्शन सिर्फ खाने के लिए नहीं जाते, बल्कि वे इसलिए जाते हैं क्योंकि बुलाने वाले से उनका कनेक्शन होता है। इस तरह वे भी आपके प्रसाद या चढ़ावा या और कुछ देकर नहीं आते, आपके प्रेम में आते हैं जो उनसे प्रेम करता, उनके लिए आते हैं। उनसे बड़ा प्रेमी कोई नहीं, प्रेम शुरू उनसे होता है, वही सबसे बड़े आशिक हैं, वही सबसे बड़े माशुक।वे मोहब्बत करना जानते हैं और मोहब्बत के बदले मोहब्बत करना भी जानते हैं। आप जिस तरीके से उन्हें मोहब्बत करते हैं वे उसी तरह से आपको मोहब्बत कर रहे हैं।
तो आप जो भी सोचते हैं या करते हैं सब उनकी मर्जी से होता है, और वे आपके बुलाने पर आएंगे।