the difference between layak Or nalayak, sign if success
वो बताते हैं कि दो मटके होते हैं — एक भरा हुआ होता है और एक खाली होता है। वो कहते हैं कि दोनों मटकों के वज़न में बहुत फ़र्क होता है, उन्हें उठाने के तरीक़े में फ़र्क होता है, दोनों मटकों से आने वाली आवाज़ में बहुत फ़र्क होता है, साथ ही दोनों मटकों से होने वाले फ़ायदे में भी बहुत फ़र्क होता है। वो कहते हैं कि दोनों मटकों में फ़र्क बताना बहुत मुश्किल नहीं होता — बहुत आसानी से, देखकर, छूकर, उठाकर या और भी तरीकों से कोई भी बता सकता है कि कौन-सा मटका भरा हुआ है और कौन-सा खाली है।
वो कहते हैं कि इसी तरह से एक योग्य और एक अयोग्य के बीच बहुत सारे फ़र्क होते हैं — जैसे उनकी पसंद और नापसंद। योग्य इंसान को किताबें पसंद आएँगी, वह पढ़ाई और समझ की बात करेगा, जबकि अयोग्य इंसान खेल-कूद और मौज-मस्ती की बात करेगा। वो कहते हैं कि योग्य इंसान की संगत अच्छी होती है या फिर वह अकेले रहते हैं, पर अयोग्य की संगत भी ग़लत होती है। वो कहते हैं कि योग्य इंसान के काम अक्सर माप और तर्क से संगत होते हैं, पर अयोग्य इंसान बेसुरे गायक की तरह गाता रहता है जिसे सुर और ताल दोनों का ही ज्ञान नहीं होता, पर ख़ुद को सबसे बढ़िया गायक मानता है।
एक योग्य इंसान किसी काम को करने से पहले सभी पक्षों को अच्छे से सोचता और समझता है, उसके बाद घर, परिवार और दोस्तों से सलाह-मशविरा करता है। पर एक अयोग्य इंसान न सोचता है, न समझता है, न पूछता है, न बताता है — सीधा काम कर देता है। हो सकता है कई बार ऐसे काम सही हो जाएँ, पर इस तरह काम करने का तरीक़ा ग़लत है। वो कहते हैं कि योग्य इंसान गलती करने के बाद उसे मान लेता है और चुप रहता है, पर अयोग्य इंसान गलती करने के बाद और ज़्यादा चिल्लाता है और अपनी गलती को नकारता है। कहते हैं, दोनों के चलने में, बोलने में, सबमें बहुत फ़र्क होता है। वो बताते हैं कि योग्य इंसान को पसंद करने वालों की संख्या कम होती है, जबकि अयोग्य के हिमायती ज़्यादा होते हैं।
‘रावाणियत’ में हमारे एक दोस्त अपनी बात लिखकर भेजते हैं। वो लिखते हैं — “मुझे कैसे पता चलेगा कि मैं काबिल हो गया हूँ?”
तो हम अपने क्लाइंट को उनके सवाल का जो सबसे बेहतर जवाब दे सकते हैं, वो लिखते हैं —
जब तुम्हारे साथ खड़े लोगों की संख्या ना के बराबर हो जाएगी,
जब तुम किसी काम को करने से पहले उसे अच्छे से सोचोगे और समझ लोगे,
गलती होने के बाद चुप रहोगे और ईमानदारी व ज़िम्मेदारी से मान लोगे,
जब तुम्हें हारने का डर ख़त्म हो जाएगा,
तुम्हारे चलने के तरीक़े में तुम्हारी मेहनत और समझ व काबिलियत दिखेगी,
तुम्हारे व्यवहार और बोल-चाल में फ़र्क आ जाएगा,
तुम किसी को भी अपने से कमतर नहीं मानोगे,
जब तुम लोगों से तारीफ़ पाने की उम्मीद छोड़कर अपना काम करते रहने का साहस जोड़ लोगे,
जब तुम कोशिश करने से पहले अपनी हार को देख पाने के बावजूद किसी-न-किसी तरह जीतने का रास्ता ढूँढते रहोगे,
और हारने के बाद फिर से कोशिश करने का साहस ढूँढ लोगे —
उस दिन समझ लेना कि तुम काबिल हो गए हो।