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How to read peoples mind

 

 

वो कहते हैं कि हम सभी झूठ बोलते हैं, हम सभी बोलते हैं — इस बात को नकारना बेकार है। हम केवल झूठ ही नहीं बोलते, सच्चाई को भी शब्दों में फेरकर उसका मतलब बदल देते हैं और अस्पष्ट रूप में बातें कहते हैं। साथ ही, हम मुख्य बात को छुपाकर इर्द-गिर्द की बातों को मुख्य बात की तरह दिखाते हैं। सभी तरीकों में हमारा मुख्य उद्देश्य केवल किसी एक विशेष बात का पता न लगने देना होता है।

वो कहते हैं कि लोग हमारे साथ बहुत बार झूठ बोलते हैं या बातें छुपाते हैं, और उनका ऐसा करना हमें दुख देता है। वो कहते हैं, सच जितनी देर से पता चलता है उतना ही अधिक दुख देता है। वो कहते हैं, इस संसार में कोई भी भेद हमेशा के लिए नहीं रहता — हर भेद खुलता है। तो झूठ बोलना या कुछ छुपाना केवल कुछ समय के लिए हो सकता है, पर उसे हमेशा के लिए नहीं छुपाया जा सकता।

इसीलिए वो कहते हैं कि झूठ नहीं बोलना चाहिए और हमेशा सच, और स्पष्ट सच बोलना चाहिए, क्योंकि सच बहुत थोड़े वक्त के लिए तकलीफ़ देता है, पर झूठ लम्बे समय से खड़ी इमारत को भी कमज़ोर कर देता है। वो कहते हैं कि झूठ जितना ज़्यादा देर तक रहता है या सच जितनी देर बाद पता चलता है, उतनी ही ज़्यादा तकलीफ़ का कारण बनता है। वो कहते हैं किसी को तकलीफ़ पहुँचाना ग़लत होता है; किसी भी वजह से झूठ नहीं बोलना चाहिए, किसी भी हाल में झूठ नहीं बोलना चाहिए।

वो कहते हैं कि पर कई बार हमें झूठ बोलना पड़ ही जाता है, और ऐसा दूसरों के साथ भी हो जाता है।

वो कहते हैं कि झूठ बोलना केवल ज़ुबान का काम होता है, इसमें शरीर का कोई और हिस्सा साथी नहीं होता; क्योंकि झूठ बोलने से बचना चाहिए, इसलिए शरीर भी साथ नहीं देता। लेकिन जब ज़ुबान अपने हिसाब से चलने लगती है तो सब से बिगड़ जाती है। वो कहते हैं, जब हम झूठ बोलते हैं तो दिल की धड़कन मामूली से बदलकर ग़ैरमामूली हो जाती है। झूठ बोलते वक़्त इंसान अपने शरीर का इस्तेमाल नहीं कर पाता, उस वक़्त शरीर अकड़ जाता है; झूठ बोलते समय इंसान का दिमाग भी उसका साथ नहीं देता, आवाज़ लड़खड़ा जाती है, और सबसे बड़ी बात — इंसान की आँखों से तुरंत पता चल जाता है कि वो झूठ बोल रहा है।

किसी की रिक्वेस्ट आई है, वे लिखती हैं कि, “खान, कैसे पता चले कि सामने वाला झूठ बोल रहा है?”

देखिए, मुझे नहीं पता कि आप किन वजहों से ये जानना चाहती हैं, पर हाँ — मैं इतना ज़रूर जानता हूँ कि ये बात मुझे बतानी चाहिए। ख़ैर, मैं आपको आपका जवाब देता हूँ जिसके लिए आप मुझसे जुड़ी हैं…

जब भी आप किसी से बात करें, उसकी आँखों का पीछा न छोड़ें। जैसे-जैसे वो बात करता जाएगा, आपको पता चल जाएगा कि कौन कब झूठ बोल रहा है। उसके चेहरे के भाव बदल जाएँगे, वो आपके इस रवैये से नर्वस हो जाएगा। जब ऐसा होगा तब आपके मन में एक ख़याल आएगा कि अब ये व्यक्ति झूठ बोल रहा है या कुछ छुपा रहा है। तब अपने मन की उस नात (संकेत) पर यक़ीन करना — आगे जो आपको सही लगे वो फ़ैसला लेना।

आप अगर एक दिन में 100 लोगों से बात करती हैं, और 100 के 100 लोगों के साथ आपके मन में तुरंत कोई विचार आता है बात करते समय, तो ऐसा न समझें कि ये तरीका ही ग़लत है, बल्कि तरीक़े में कोई कमी नहीं है — बल्कि वे सारे लोग ही झूठ बोल रहे हैं, या सच नहीं बता रहे, या अस्पष्ट सच बता रहे हैं। क्योंकि उनके दिमाग में उस वक़्त कोई ख़याल चल रहा होता है; वे कहानी या बात को गढ़ रहे होते हैं, लेकिन बॉडी कोऑर्डिनेशन न होने की वजह से वो उनके शरीर में दिखता है — उनकी बैठने, बोलने, खड़े होने, चलने, एक्सप्रेशन में और बहुत सी चीज़ों में।

ऐसे में सबसे आसान होता है उनकी आँखों को गौर से देखना।

तो तरीक़े को ग़लत न समझें, बल्कि इस बात को समझें कि इस दौर में सभी झूठ बोलते हैं और झूठ बोलना बहुत आम समझते हैं।

 

 

 

 

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