वो कहते हैं कि, ऐसा बहुत बार होता है कि डरने की कोई बात नहीं होती, पर फिर भी इंसान कतराता है, घबराता है। कोई अनजान-सी फीलिंग उसे रोक लेती है जो डर जैसी होती है। वो कहते गए, इस फीलिंग का कोई ओरिजिन नहीं होता, ये एक भ्रम (illusion) होता है इंसान का और कुछ भी नहीं।
वो कहते हैं कि ऐसे वक्त में इंसान कमजोर हो ही जाता है, इसमें उसका कोई कसूर नहीं है। वो कहते हैं कि ये फीलिंग बहुत सारे कामों को होने से रोक देती है और बाद में यही निराशा का कारण बनती है, जो दुखदाई होती है, जिसे सहना मुश्किल होता है। वो ऐसे फीलिंग्स से बचने का एक ही रास्ता बताते हैं — उनका विरोध करना और उन्हें हराना।इसी तरह से एक कपल ने अपॉइंटमेंट बुक की और तय समय पर मेरे ऑफिस आए, जहाँ मैं रहता हूँ। दोनों पति-पत्नी किसी भी प्रकार से नाखुश नहीं थे, वे आपस में बहुत खुश और एक-दूसरे के प्रति निष्ठावान थे। खैर, उनसे बात करने पर पता चला कि उनके पति को एक समस्या है।
मैंने उनके पति से पूछा तो उन्होंने बताया कि वे स्कूबा डाइविंग करना चाहते हैं और कई बार प्रयास भी किया, पर हर बार अंतिम घड़ी में डर के कारण पैर पीछे कर लिए। वे बताते हैं कि उत्साह से उन्हें आर्थिक तौर पर बहुत नुकसान हुआ, साथ ही मनोबल भी टूटा। वे जोड़ते हैं कि उनकी बहुत दिली ख्वाहिश है स्कूबा डाइविंग करने की, तो वे मुझसे इस संदर्भ में सलाह-मशवरा करने आए हैं कि कैसे वे अपने इस डर पर जीत पाएँ और अपने दिल की इस इच्छा को पूरा करें।वो कहते हैं कि समस्या हो सकती है बहुत बड़ी और गंभीर, पर जब मरीज से कहा जाए कि “कोई बड़ी बात नहीं है” तो मरीज आधा तो वहीं ठीक हो जाता है। पर अगर उससे कहो कि “बहुत ज़्यादा बीमार है” तो ना बीमार आदमी भी बहुत बीमार हो जाता है।
इसीलिए अच्छे डॉक्टर मरीजों को हमेशा यही बोलते हैं कि “कोई बड़ी बात नहीं है।” वो कहते हैं कि अच्छे शब्दों से बहुत बड़े ज़ख्म भी भरे जा सकते हैं और बहुत बड़े ज़ख्म देने के लिए भी सिर्फ कुछ अच्छे शब्द ही काफी होते हैं।हालाँकि मेरे इस क्लाइंट की परेशानी सच में कोई बड़ी बात नहीं थी, ऐसा सबके साथ होता है। पर उनके मन में ये एक बड़ी समस्या थी, तो मैंने उनसे कहा कि कोई बड़ी बात नहीं है।
हँसते हुए मैंने उनसे कहा कि आप लोग मुझे भी ले चलिए साथ, तो उन्होंने भी हँसते हुए जवाब दिया कि “बहुत खर्चा होता है वहाँ!”
हँसी-मज़ाक ज़िंदगी का एक हिस्सा होना चाहिए, ये लाइफ़ के स्ट्रेस को बैलेंस करने में बहुत काम आता है।मैंने उनसे कहा कि अब जब ऐसा हो तो हटने से पहले इन दो सवालों के जवाब ज़रूर ढूँढ लें —किस बात का डर है मुझे — इस सवाल को करने से उस डर का मूल कारण ढूँढने में मदद मिलेगी। और जब उसका कहीं कोई वास्तविक कारण है ही नहीं, तो डर बचेगा ही नहीं।दूसरा सवाल — मेरे कूदने के बाद क्या होगा — इस सवाल से जिज्ञासा (curiosity) पैदा होगी, जो उन्हें एक्साइट करेगी और यही एक्साइटमेंट उन्हें डाइव करने के लिए प्रेरित करेगी। एक समय ऐसा होगा जब वे खुद ही कूद जाएँगे।मैंने उनसे कहा कि ये सवाल ज़ोर-ज़ोर से खुद से पूछें और उनके जवाब भी ज़ोर से दें — ऐसा करने से वो डर उन पर हावी नहीं होगा। उनके मन में और विचार नहीं चलेंगे, जिससे डर उन पर हावी नहीं हो पाएगा।अंत में मैंने उनसे कहा कि अगली बार, मुझे भी अपने साथ ले चलिए।