वो कहते हैं कि… ये जो दुनिया है इसमें दो चीज़ें बहुत आम हैं — पहली रोशनी, दूसरी अँधेरा।
रोशनी में रौनक होती है, हलचल होती है, चहल होती है, पहल होती है।
अँधेरे में सन्नाटा होता है, ख़ामोशी होती है, शोर होता है (यहाँ शोर का मतलब कानों को न पसंद आने वाली आवाज़ों से है)।
वो कहते हैं, अँधेरे में नापसंद आने वाली आवाज़ें होती हैं, जो हमें परेशान करती हैं।
अँधेरे में खालीपन होता है,इसमें इंसान भटक जाता है।
वो कहते हैं कि इसीलिए मैंने रात सोने के लिए बनाई और दिन काम करने के लिए, ताकि इंसान अँधेरे में खो न जाए।
वो कहते हैं, इस दुनिया में पहले अँधेरा था — उस अँधेरे को दूर करने के लिए मैंने सूरज, चाँद और सितारे बनाए ताकि मेरा बच्चा, मेरा बंदा, मेरे अपने, भटक न जाए।
वो कहते हैं, अँधेरा दुख देता है — उस खालीपन में आपके सिवा दूर तक कोई नहीं होता।
आप जो चाहते हैं वो नहीं होता, और जो होता है उसे आपको स्वीकार करना पड़ता है।
अँधेरे में वक्त काटने के लिए कुछ नहीं होता जैसा उजाले में होता है।
वो कहते हैं, यह उजाला मन बहकाता है — जिससे वक्त कट जाता है, दिल बहल जाता है।
बहरहाल ये झूठ है, भ्रम है — पर अँधेरे से बेहतर है।वो कहते हैं नरक कुछ नहीं है सिवाय अँधेरे के, और स्वर्ग उजाले के सिवा कुछ नहीं।
नरक में वक्त काटने के लिए कुछ भी नहीं, जबकि स्वर्ग मन बहलाने वाली चीज़ों से भरा है।
वो कहते हैं कि मैंने कुछ भी किसी से नहीं छुपाया — न नरक, न स्वर्ग, जो हे सबके सामने है।
वो कहते हैं कि अगर स्वर्ग चाहिए तो रोशनी में रहो, और नरक चाहिए तो अँधेरे में।
रोशनी में सुकून है, अँधेरे में न खत्म होने वाली बेचैनी।
अँधेरे में इंसान किसी को सुनाई दे इसलिए चिल्लाता है, पर कोई सुनने वाला नहीं होता।
आदमी थक जाता है, टूट जाता है, तकलीफ़ में चिल्लाता है — पर उससे कुछ नहीं होता।
वो कहते हैं कि अगर आप अकेले हैं और अँधेरे में फँसे हैं तो रोशनी की तरफ चलिए, लोगों में बैठिए, उनके साथ रहिए।
आपको जैसे लोग पसंद हैं, दुनिया वैसे लोगों से भरी हुई है — पर अँधेरे से दूर रहिए, वहाँ मत जाइए।
ये केस कुछ इसी तरह का है,
एक माँ अपने बच्चे को लाती है और वो बताती है कि उनके बच्चे का व्यवहार कुछ दिनों से बदल गया है, जो उन्हें परेशान कर रहा है।
तो मैंने देखा, एक छोटा बच्चा है।
मैंने उनसे पूछा, तो वो बताती हैं कि उनका बच्चा कई दिनों से स्कूल नहीं जाता, किसी से बात नहीं करता, वजह पूछो तो नहीं बताता, और कमरे में ही रहता है।
उन्होंने कहा कि बहुत पूछने पर बच्चे ने बताया है कि वो एक ‘mysterious man’ बनना चाहता है — जिसके बारे में कोई नहीं जानता हो।
हो सकता है यह ख़याल उसे कहीं से लग गया हो जहाँ ऐसे लोगों को glorify किया गया हो — पर ऐसा नहीं होता।तो ऐसा मत करो — आपको आज वो glorious लग रहे होंगे, पर ऐसा नहीं होता।
पर अब उस बच्चे को ये समझाना बड़ा मुश्किल था, क्योंकि उसे बहुत आसान शब्दों में, बहुत हल्के ढंग से समझाना था।
फिर भी बच्चों के मन में ये बात होती है कि “ये मुझे बच्चा समझकर बहलाने की कोशिश कर रहे हैं।“
ऐसे में उन्हें बड़े हिसाब से संभालना होता है।मैंने उस बच्चे से बातचीत की, उसका नाम पूछा, उसके दोस्तों के नाम पूछे, उनके बारे में जाना, फिर उससे उसके दोस्तों के साथ की घटनाएँ सुनीं।
फिर मैंने कहा कि अब मुझे उसके किसी दोस्त से मिलने का मन हो रहा है।
मैंने उससे कहा कि मेरे दोस्त तुम्हारे जैसे नहीं हैं।
वो बोला कि मेरे दोस्त तो ऐसे हैं…
और ऐसी बातें करके उसने अपने दोस्तों और उनकी फैमिली के बारे में बताया।बहुत देर बात करने के बाद मैंने उससे कहा — अब खाने का समय हो गया है।
मैंने पूछा कि उसे खाने में क्या पसंद है, चलो ऑर्डर कर लेते हैं।
उसने कहा कि मैं खुद ऑर्डर करूँगा।
थोड़ी देर में डिलीवरी बॉय का कॉल आया।
मैंने बच्चे से कहा — फोन उठाओ और पार्सल ले लो।
उसके दिमाग से उस विचार को तुरंत मिटाना संभव नहीं था, लेकिन उसे वहीं टिकने नहीं देना ज़रूरी था, ताकि वह उसके भविष्य में परेशानी न बनाए।
इसलिए हमने तय किया कि वह विचार एक ही जगह पर न रुके।
इसके लिए बच्चे को अलग-अलग लोगों से बात करवाना और खुद बात में शामिल रहना ज़रूरी था।रेस्टोरेंट को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता था।
मैंने पहले ही उनसे कह दिया था कि जिस भी डिलीवरी बॉय को भेजें, उससे कहना कि बच्चे को बातचीत में शामिल करे — और कोशिश करे कि बच्चे का हिस्सा ज्यादा रहे।
उन्होंने वैसा ही किया।
बच्चा पार्सल लेकर आया।
हम सबने साथ खाना खाया, बातें कीं।
फिर मैंने उससे कहा, चलो कोई अच्छी सी फिल्म देखते हैं।
उसने अपनी पसंद की फिल्म लगाई।
मेरा मकसद फिल्म देखना नहीं था, पर मज़ा बहुत आया — बच्चे ने हर दृश्य पहले बता दिया:
“अब हीरो आएगा, अब ऐसा होगा, अब देखना ये होगा — मैंने ये फिल्म बहुत बार देखी है।”
अंत में मैंने माँ से कहा — बात बहुत बड़ी नहीं है, पर नुकसान कर सकती है।
इसलिए बच्चे से जुड़कर रहो, उससे बातें करो, और उसमें उसका involvement ज़्यादा रखो।
मैंने कहा, एक हफ्ता ऐसा चलाओ, फिर मुझे दोबारा मिलो।
पता नहीं क्यों, पर कुछ लोगों को mysterious, arrogant, alone, silence — ये सब अच्छा लगता है, तो इसे अपनाने की कोशिश करते हैं।
उन्हें ये “cool” लगता है, पर ये चीज़ें जल्दी ही सेहत बिगाड़ देती हैं — मानसिक रूप से, शारीरिक रूप से, भावनात्मक रूप से।
ऐसे इंसान मज़बूत नहीं होता, कमज़ोर हो जाता है।
एक अकेली लकड़ी मज़बूत नहीं होती; बहुत सारी लकड़ियाँ मिलकर मज़बूत होती हैं।
जिसे लोग mysterious कहते हैं, उसी को suspicious भी कहते हैं।
इसलिए ऐसा मत करो — और ऐसा सोचो भी मत।इस तरह आपका मूल अर्थ, शब्द और भाव सब वैसे ही बने रहते हैं — बस इसे सही पैराग्राफ़ व्यवस्था में लाया गया है ताकि वेबसाइट या दस्तावेज़ में पढ़ना आसान हो।