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How to avoid failure, how to success in once

एक लड़का मेरे पास आया और एक बहुत ही सामान्य सवाल पूछा, उसने कहा – “मैं बहुत बार और अलग-अलग चीज़ों में फेल हो चुका हूँ।“ उसने यह भी जोड़ा कि वह फिर से फेल होने के डर से नई चीज़ें करने का अपना हौसला खो चुका है। इसलिए उसने मुझसे पूछा कि हमेशा पॉजिटिव कैसे रहा जाए।

वह जवान और बहुत मेहनती लड़का 25 साल से कम या आसपास का रहा होगा, जब मैं बस उससे बात करने ही वाला था तो वह (यहाँ वह मतलब भगवान से है) कहता है, उसे एक नया नज़रिया दो।

एक दिद-ए-नज़ारा ऐसा हो कि हारा मुसाफिर फिर चले

हरा लौटे फिर मुसाफिर बस आराम करे और फिर चले

जैसे उसने कहा मैंने वही किया (यहाँ उसका मतलब भगवान से है) तो पहले मैंने उससे पूछा कि वह फेल्यर के बारे में क्या सोचता है, मतलब आपके हिसाब से फेल्यर क्या है – उसने कुछ सेकंड या एक मिनट लिया और कहा “मैं समझ नहीं पा रहा हूँ आपका क्या मतलब है?” उसने जोड़ा, “कृपया इसे मेरे लिए और आसान बनाइए।“ – तब मैंने उसे जवाब दिया, आपने मुझसे एक सवाल पूछा है ना और उसकी डिस्क्रिप्शन में आपने फेल्यर शब्द का इस्तेमाल किया है – मैंने जोड़ा, हम हमेशा अपनी बातचीत में उन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, हमें उनसे अवेयर होना चाहिए मतलब हमें उनका मतलब पता होना चाहिए – क्या आपको नहीं लगता कि जो शब्द हम इस्तेमाल करते हैं‌ उन्ही से हमें रिजल्ट मिलते हैं, इसलिए हमें उन्हें जानना चाहिए और हम सब ये बात के बारे में जानते हैं – जो लोग नहीं जानते कि कौन से शब्द चुनने हैं, वे अपनी असली प्रॉब्लम एक्सप्रेस नहीं कर पाते – इसलिए आपने अपनी प्रॉब्लम को एक्सप्रेस करने के तरीके में फेल्यर का ज़िक्र किया है –

उसे इस तरह से कुछ कन्फ्यूज़न हो रहा होगा, इसलिए मैंने तरीका बदलना सही लगा – मैंने कहा, फेल्यर क्या है, पेपर पर वह सब कुछ लिखो जो तुम लिख सकते हो और मैंने उसे कुछ पेपर दिए, ‘वो’ कहते हैं कि जब तक प्रॉब्लम सिर्फ मन में होती है या दिमाग में होती है, तब तक वह बहुत ज़्यादा बड़ी लगती है, वो एक शेर में बताते हैं कि

पहले दौर-ए-हाल सीखा, फिर अंदाज़-ए-बयां सीखा

हमने यार-ए-वफा समझी, फिर ख्वाब-ए-गवां सीखा

वो इस शेर में बताते हैं कि पहले इंसान को समझना चाहिए कि मुश्किल क्या है, फिर वो उस मुश्किल को समझाएगा कैसे, फिर वो कहते हैं ‘यार-ए-वफा समझी’, यार-ए-वफा में उन्होंने मेटाफर यूज़ किया है, वो लिखते हैं कि ऐसा क्यों हुआ ये समझा जाए, फिर वो बताते हैं जो नहीं हुआ मतलब जो आप चाहते थे वो उस तरीके से हुआ तो उस तरीके को या उनको छोड़ना पड़ता है और ये सारी चीज़ें सीखनी पड़ती हैं, तब इंसान आगे बढ़ता है, तो हम उनके बताए इसी सलाह से काम करेंगे…

तो उस बच्चे ने कुछ पेपर का यूज़ किया, उनमें से कुछ पेपर उसने कुछ लाइनें लिखीं फिर काट दीं, किसी पर उसने लिखा, तो उसने जो फाइनल वर्जन लिखा, उसमें वो लिखता है कि “किसी काम का नहीं हो पाना फेल्यर होता है।“ मैंने बच्चे के लिए ज़्यादा कॉम्प्लिकेट नहीं किया, मैंने उससे फिर सवाल किया कि फेल होता क्यों है – कि आपका काम जो करना चाहते हैं वो क्यों नहीं हो पाता, आप फेल क्यों हो जाते हैं, यही है ‘यार-ए-वफा समझी’ वाला फेज कि किसी काम के होने या न होने का कारण क्या है। तो वो बच्चा कहता है कि मैं कोई भी तरीका यूज़ करता हूँ तो मैं फेल हो जाता हूँ, फिर उसे फाइनली कैसे समझाना है, आइडिया लग गया.. मैंने बाज़ु से रखी एक बोतल ली और एक गिलास लिया, मैंने उस बोतल से बिना ढक्कन खोले पानी निकालने की बहुत सारी कोशिशें की, पर बोतल का पानी गिलास में नहीं आया, मैंने उनसे कहा कि मेरी मदद करो, कैसे होगा? उन्होंने बोतल पकड़ी और उसका ढक्कन खोला और पानी गिलास में डाल दिया, मैंने उनसे बोला कि यार, मैंने बहुत कोशिश की, पर हर बार फेल हो जाता था, लेकिन तुमने एक ही कोशिश में सब सही से कर दिया – तो उस बच्चे ने कहा, क्योंकि, सही तरीका इस्तेमाल करोगे तो फेल नहीं होंगे,, मैंने कहा कि मुझे कैसे पता चलेगा कि तरीका सही है? अब वो थोड़े हैरानी में था, वो बोला कि ये तो ट्राई करने पर ही पता चलता है, फिर मैंने उनसे कहा कि आपने जितने रास्ते ट्राई किए वो सब फेल हो गए, क्या इसका मतलब ये है कि वो सब गलत थे? मेरे कहने का मतलब था कि आपने भी गलत तरीके इस्तेमाल किए होंगे, तभी आप फेल हुए, किसी का पॉइंट ऑफ चेंज करना बिल्कुल उसके माइंड में एक नया पेड़ प्लांट करने जैसा होता है, पहले तो पुराना वाला गलत है, उसके लिए सीडिंग करनी होती है, फिर धीरे-धीरे पर्स्यू करना होता है, पानी देना और बाकी चीज़ें करनी होती हैं, बहुत ईज़िली किसी की प्रॉब्लम को सॉल्व नहीं किया जा सकता, मतलब मैं उस बच्चे से अगर डायरेक्ट ये बात कहता तो डाइजेस्ट नहीं कर पाता,, धीरे-धीरे वो यहाँ तक आया कि उसने अग्री किया कि अगर अब मैं सोचूँ, जब मैंने वो सब रास्ते ट्राई कर लिए है , तब, तो वे सब गलत थे, और गलत रास्ते से सक्सेस नहीं मिलती, फिर ‘वो’ कहते हैं कि आप अपने ही इमोशंस को एक्सेप्ट नहीं करते, आप उन्हें रिजेक्ट करते हैं और ऑपोज़िट इमोशन जो फेक होते है दोनों इमोशन्स आपस में क्लैश करते हैं, अब जो ओरिजिनल इमोशन है वही डॉमिनेट करता है, हम उसे एक्सेप्ट तो कर ही नहीं पा रहे थे तो रिजेक्शन की फीलिंग है, इसी को नेगेटिव फीलिंग बताते हैं, ‘वो’ कहते हैं कि जब रिजेक्टिंग फीलिंग बढ़ती है, वैसे-वैसे ही नेगेटिविटी बढ़ती है। तो मैंने उस बच्चे से कहा कि क्या आप मानते हो, कि आपने जितने भी तरीके अब तक इस्तेमाल किए, वे सारे गलत थे, इसीलिए आपको बार-बार फेल होना पड़ा,, उसने थोड़ा पॉज़ लिया, फिर हँसते हुए कहा कि सच बात तो यही है, वो कहते हैं कि मैंने कई बार प्रोसेस बीच में काट दी, कई बार अपने हिसाब से उसमें चेंज कर दिए, मैंने एक बार भी बिल्कुल सही तरीका यूज़ ही नहीं किया, तो मैंने उनसे आखिर में पूछा कि अब क्या करोगे,, तो वो बोले कि मैं पहले कुछ दिन आराम करूँगा, फिर सही तरीका समझूँगा और फिर ट्राई करूँगा…

 

 

 

 

 

 

 

 

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