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Problms with wife, how to handle your wife.fight between couples

मेरे पास एक क्लाइंट आया मेरी कंसल्टेंसी में, मैंने उसकी प्रॉब्लम सुनी, फिर उसे सॉल्यूशन दिया”

किसी ने अपॉइंटमेंट बुक किया और क्वेरी लिखी कि वो अपनी फैमिली के रवैये से परेशान है उस बारे में। उस क्लाइंट की बारी आई।

क्लाइंट ने बताया कि जब वो अपनी जॉब से अपने घर वालों के पास आता है तो उसकी वाइफ उससे बहुत किचकिच करती है, जिसकी वजह से उनका झगड़ा हो जाता। “हमारी शादी को अभी सिर्फ दो साल हुए हैं पर अब मैं इस रोज़ के शाम-शाम के झगड़े से बहुत तंग आ चुका हूँ। कहा अगर तुम्हारी बात मानकर भी मेरा काम नहीं बना तो फिर मुझे अपनी वाइफ से डिवोर्स लेना पड़ेगा।“

मैंने उसकी सारी बात सुनी (जिसके मुझे पैसे मिलते हैं), मैं समझ गया वो बहुत फ्रस्ट्रेट हो चुका अपनी जॉब से इसीलिए ऑफिस खत्म होने के बाद वो अपनी डिज़ायर वाली लाइफ चाहता है, पर घर पहुँचते ही जैसे ही उसकी वाइफ उससे कुछ कहती है या पूछती है तो वो ट्रिगर हो जाता। ऑफिस के वर्क्स से, एम्प्लॉयी के रवैये, बॉस के एक्शन्स की वजह से वो बहुत पक जाता, पर जैसे ही ऑफिस खत्म होता है वो अपने थॉट में रखता कि अब लाइफ थोड़ी अच्छी रहेगी until द next coming मॉर्निंग। पर जैसे ही घर जाता है उसकी वाइफ उससे कुछ पूछे या कहे तो अब यहाँ वो खुद कॉन्शियस वे में कुछ नहीं करता, वो सबकॉन्शियसली ट्रिगर होता है – मतलब वो फीलिंग्स जो इसके थॉट्स में थी वो ब्रेक हो जाती है, क्योंकि बीवी का कुछ भी कहना या सुनाना सेम रिपीटेड हो जाता है उसकी डे लाइफ उसकी ऑफिस लाइफ की तरह ही फील होता है सबकॉन्शियसली। उसकी गुड टाइम्स को स्पेंड करने वाली फीलिंग वाइफ के इस एक्शन से हर्ट हो जाती। इसी पैटर्न में आगे वो सबकॉन्शियसली ही जवाब दे देता या कई बार कॉन्शियसली भी (कॉन्शियसली जब-जब वो लड़ाई करने के लिए किसी कारण का इंतज़ार कर रहा हो – ऐसा अक्सर होता है कि आदमी, ह्यूमन, ऑर सब लिविंग पर्सनैलिटीज़ आज अगर हार जाए तो कल के लिए गुगस्त रह जाता है – और वो मौका ढूंढते हैं)। हम यहाँ दोनों ही बातों को ध्यान में रखेंगे कॉन्शियस को भी और सबकॉन्शियस को भी, क्योंकि कई बार तो वो अनजाने में ट्रिगर होने की वजह से रिप्लाई कर देता है, पर कई बार लास्ट कन्वर्सेशन को माइंड में रखकर पहले से प्रिपेयर होकर एक बात को माइंड में रखकर लड़ने की नियत से रिप्लाई करता है।

फिर मैंने उनसे पूछा कि वो क्या करते हैं, मतलब उनका जॉब प्रोफाइल क्या है? तो उन्होंने बताया वो किसी कंपनी में सेल्स डिपार्टमेंट में मैनेजर हैं। फिर मुझे थोड़ी हँसी आई… क्या करें आ जाती है। उनको अच्छा नहीं लगा ज़ाहिर है किसी को नहीं, पर फिर मेरी हँसी खुल गई और थोड़ी आगई। मैंने दो मिनट आँखें बंद की और फिर खूब हँसा, मैं रुका और उनसे पूछा कि वो मुझे अपने कुछ क्लाइंट्स की और उनकी कन्वर्सेशन को बताएँ डिटेल में बताएँ।

उनसे जब मैंने उनके कुछ क्लाइंट्स के साथ उनकी कन्वर्सेशन सुनी, तो मैं समझा कि उनका काम है क्लाइंट आइडेंटिफाई करना, फिर उसे ट्रायल करना और उसके बाद उसे कॉन्विंस करना। पर इन सब में उन्हें बहुत कुछ टॉलरेट करना पड़ता है, जिसमें क्लाइंट का बिहेवियर, उसे कॉन्विंस कराने का प्रेशर, और ऐसे ही और भी क्लाइंट्स को कॉन्विंस करना, फिर अलग से बॉस और ऑफिस के लोगों को हैंडल करना। तब मैं समझ पाया कि ये इंसान (मेरा क्लाइंट) अपना फ्रस्ट्रेशन जो दूसरों पर नहीं निकाल सकता वो अपनी वाइफ पर निकाल देता। खैर, वो जानकर नहीं करते। उनके कॉन्शियस माइंड में कहीं ये बात बहुत क्लियर हो चुकी है कि वो अगर अपने क्लाइंट पर फ्रस्ट्रेट होंगे, या अपना फ्रस्ट्रेशन अपने ऑफिस के लोगों, या बॉस पर निकालने की कोशिश करेंगे तो उनकी नौकरी जा सकती है और उनका सरवाइवल दिक्कत में आ सकता है। इसी डर से वो (या उन जैसे नौकरी-पेशा लोग) अपने फ्रस्ट्रेशन को अपने भीतर ही रखना होता है। ये एक अनरिटन रूल है। पर वो फ्रस्ट्रेशन निकलना चाहता है और वो निकलेगा – वो फ्रस्ट्रेशन वहाँ निकलेगा जहाँ उन्हें नुकसान नहीं होना। तो वही उनके सबकॉन्शियस माइंड में कहीं ये बात भी क्लियर है कि फैमली के साथ वो किसी भी तरह से बात कर सकते और कुछ भी कह सकते हैं, क्योंकि इतने सालों में हम ऐसा ही तो करते आए हैं – फैमली में पैरेंट्स के साथ या सिबलिंग्स के साथ बिना कुछ सोचे, हम जो कह रहे हैं वो कहना चाहिए या नहीं, हमारा तरीका सही है या नहीं, कई बार हमारी बात भी सही है या नहीं… तो हम बिना सोचे-समझे उनसे कह देते हैं। इसके रिजल्ट में काफी झगड़ा होता है, लेकिन उसके बावजूद भी हम उन्हीं के साथ रहते हैं। तो इसी तरह की प्रैक्टिस बहुत लंबे समय तक होने से ये बात हुआ करे सबकॉन्शियस माइंड में फीड हो जाती है, और इसी तरह से ये ऑटोमैटिकली हो जाता है।

तो मेरे क्लाइंट के केस में जैसे ही वो घर जाते हैं तो उनकी वाइफ उनसे कुछ कहती होंगी वर्बली या नॉन-वर्बली, जिसका रिप्लाई ये (यानी मेरा क्लाइंट) दे देते। तो या तो इनका एक्सेंट या एक्शन या एक्सप्रेशन या फिर वर्ड्स या और कोई चीज़ उनके हिसाब से ठीक नहीं होती होगी, जिस वजह से दोनों के बीच झगड़ा हो जाता। हो सकता है ऐसा उनकी वाइफ से भी होता हो। 80% झगड़े इन्हीं छोटी-छोटी चीज़ों की वजह से हो जाते हैं। क्योंकि क्लाइंट से अच्छे तरीके से अच्छी बात करना, उनके सामने बैठना, स्माइल करना वगैरह… सब सिखाया जाता है, लेकिन फैमली के साथ बात करना, उनके साथ बैठना, स्माइल करना वगैरह… ज़रूरी चीजें नहीं सिखाई जाती। पर अगर हमें ये सारी बातें आती या सिखाई जाएँ तो मैं नहीं कहता कि 80% ही कम हो जाएँगे, बल्कि 80% झगड़ों में से बहुत सारे तो कम हो जाएँगे।

तो एंड में मैंने अपने क्लाइंट को एडवाइज़ दी कि “जिस तरीके से वो अपने क्लाइंट से बात करते हैं, उनके साथ बिहेव करते हैं, अपने बॉस के साथ बिहेव करते हैं, सेम वे में अपनी वाइफ के साथ बिहेव करें। वन मंथ आप ट्राई करें, अगर कुछ बेहतर लगे तो कंटिन्यू करें, वर्ना मुझे दोबारा बताएँ, हम कुछ और ट्राई करेंगे।“

क्या आपको नहीं लगता कि हम में से ज़्यादातर लोग इसी प्रॉब्लम से जूझ रहे हैं?

हमेंबाहर बात करने का तरीका सिखाया जाता है, पर घर में बात करने का तरीका नहीं। क्या आपके साथ भी ऐसा होता है?

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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